नव वर्ष केवल कैलेंडर की तारीख बदलने का नाम नहीं होता, यह अपने भीतर झाँकने, अपने संबंधों को टटोलने और जीवन के रास्तों को नए अर्थ देने का अवसर भी होता है। ऐसे समय में जब दुनिया तेज़ी से आगे बढ़ रही है, रिश्ते भी उतनी ही तेज़ी से बन और बिगड़ रहे हैं। इस बदलती दुनिया में चार शब्द ऐसे हैं, जो अगर जीवन में संतुलित रूप से बने रहें, तो इंसान का मन, समाज और संसार- तीनों सुंदर हो सकते हैं। ये शब्द हैं-संबंध, सवाल, सम्मान और रुचि।
संबंध : जुड़ाव जो मन से बने
संबंध केवल खून के रिश्तों तक सीमित नहीं होते। संबंध दोस्ती के होते हैं, सहकर्मियों के होते हैं, गुरु–शिष्य के होते हैं, और कई बार अजनबियों से भी बन जाते हैं। लेकिन हर संबंध का आधार एक ही होता है-मानवीय संवेदना।
एक सच्चा संबंध वह नहीं होता, जो मजबूरी में निभाया जाए या स्वार्थ के लिए जोड़ा जाए। सच्चा संबंध वह होता है, जहाँ दो लोग एक-दूसरे की उपस्थिति से सुकून महसूस करें। जहाँ साथ होने से बोझ नहीं, बल्कि सहजता महसूस हो।
रक्त संबंध हमें जन्म से मिल जाते हैं, लेकिन दोस्ती, अपनापन और विश्वास समय के साथ बनते हैं। और यही संबंध सबसे नाज़ुक भी होते हैं, क्योंकि इन्हें रोज़ निभाना पड़ता है।
आज के समय में संबंध अक्सर लेन-देन पर टिके दिखते हैं। “आप मेरे काम आएँगे, तो मैं आपके साथ हूँ”-यह सोच संबंधों को खोखला बना देती है। जबकि सच्चे संबंध वे होते हैं, जो कठिन समय में भी साथ खड़े रहें, बिना शर्त, बिना हिसाब।
सवाल : अधिकार नहीं, अपनापन
सवाल अक्सर नकारात्मक रूप में देखे जाते हैं, लेकिन हर सवाल गलत नहीं होता। जिस संबंध में भाव, अपनापन और भरोसा होता है, वहाँ सवाल भी होते हैं।
हम अजनबी से सवाल नहीं करते, हम उनसे सवाल करते हैं जिनसे हमें लगाव होता है।
जब कोई माँ अपने बेटे से पूछती है-“तू ठीक तो है न?”
जब कोई दोस्त पूछता है-“आज कुछ परेशान लग रहे हो?”
जब कोई साथी कहता है-“तुम बदल तो नहीं गए हो?”
ये सवाल अधिकार से नहीं, चिंता और रुचि से पैदा होते हैं।
हाँ, सवाल तब समस्या बन जाते हैं जब वे शक, नियंत्रण या अहंकार से पूछे जाएँ। लेकिन जब सवाल दिल से आते हैं, तो वे रिश्तों को गहरा करते हैं।
सवाल दरअसल यह बताते हैं कि सामने वाला व्यक्ति हमारे लिए मायने रखता है। जिस रिश्ते में सवाल खत्म हो जाएँ, वहाँ अक्सर संवाद भी खत्म होने लगता है।
रुचि : जानने की इच्छा
रुचि वह भाव है, जो किसी इंसान को दूसरे इंसान के जीवन में झाँकने की अनुमति देता है-सम्मान के साथ।
हमें रुचि उन्हीं लोगों में होती है, जिनसे हम जुड़ाव महसूस करते हैं। हम उनकी पसंद जानना चाहते हैं, उनकी तकलीफ समझना चाहते हैं, उनके सपनों के बारे में सुनना चाहते हैं।
रुचि बिना दिखावे के होती है।
आप किसी से सच में जुड़े हों, तो आपको यह जानने की जिज्ञासा होगी कि वह कैसा महसूस कर रहा है, क्या सोच रहा है, किस दौर से गुजर रहा है।
आज की दुनिया में रुचि भी अक्सर औपचारिक हो गई है।
“कैसे हो?” पूछकर जवाब सुने बिना आगे बढ़ जाना-यह रुचि नहीं, यह सामाजिक औपचारिकता है।
वास्तविक रुचि वह है, जहाँ सुनने का धैर्य हो, समझने की कोशिश हो।
सम्मान : जो भीतर से आए
सम्मान किसी पद, पैसे या दबाव से पैदा नहीं होता।
जो सम्मान किसी लालच में दिया जाए, वह सम्मान नहीं, मजबूरी होती है।
और जो सम्मान डर से आए, वह सिर्फ दिखावा होता है।
सच्चा सम्मान भीतर से आता है।
जब हम किसी के विचारों को महत्व देते हैं,
जब हम उनकी सीमाओं का आदर करते हैं,
जब हम असहमति में भी उनकी गरिमा बनाए रखते हैं-वही सम्मान है।
सम्मान का सबसे सुंदर रूप यह है कि हम सामने वाले को “इंसान” की तरह देखें, न कि साधन की तरह।
आज की दुनिया में सम्मान अक्सर शर्तों से जुड़ा है-जब तक आप मेरे काम के हैं, तब तक आप आदरणीय हैं। यह सोच रिश्तों को खोखला कर देती है।
चारों का संतुलन
संबंध, सवाल, रुचि और सम्मान-ये चारों शब्द अलग-अलग नहीं हैं।
ये एक ही धागे के चार रंग हैं।
अगर संबंध है लेकिन सम्मान नहीं, तो वह संबंध टिकता नहीं।
अगर सवाल हैं लेकिन रुचि नहीं, तो वे सवाल बोझ बन जाते हैं।
अगर रुचि है लेकिन सीमा का सम्मान नहीं, तो रिश्ता दम घुटने लगता है।
एक स्वस्थ संबंध वही है, जहाँ
अपनापन हो,
संवाद हो,
सम्मान हो,
और एक-दूसरे को समझने की ईमानदार कोशिश हो।
आज की दुनिया और मतलब के रिश्ते
आज के समय में मतलब के लिए संबंध बनाना आसान हो गया है। सोशल मीडिया ने संपर्क बढ़ा दिए हैं, लेकिन संवेदना घटा दी है।
ऐसे में सम्मानपूर्ण संबंध बन पाना चुनौती बन गया है।
क्या आज ऐसे लोगों को पहचान पाना आसान है, जो बिना स्वार्थ के संबंध निभाते हों?
शायद नहीं।
लेकिन असंभव भी नहीं।
ऐसे लोग कम हैं, लेकिन हैं।
वे भीड़ में नहीं, शांति में मिलते हैं।
वे दिखावे में नहीं, व्यवहार में दिखते हैं।
नव वर्ष की कामना
नव वर्ष के इस पहले लेख के माध्यम से यही कामना है कि आने वाला पूरा वर्ष हम संबंधों को संख्या में नहीं, गुणवत्ता में बढ़ाएँ।
हम सवाल पूछें, लेकिन प्रेम से।
हम रुचि लें, लेकिन सीमा के साथ।
और सबसे ज़रूरी-हम सम्मान दें, बिना किसी स्वार्थ के।
अगर हम ऐसा कर पाए, तो शायद
रिश्ते बोझ नहीं रहेंगे,
सवाल चोट नहीं करेंगे,
और सम्मान दिखावा नहीं रहेगा।
तब संबंध सिर्फ नाम नहीं होंगे,
बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाएँगे।
(नव वर्ष की पहली सोच, पहली संवेदना)
लेखक: एम बी बलवंत सिंह खन्ना

