कोरबा

दो साल तक चोरी की बुलेट चलाता रहा युवक, सर्विसिंग कराने पहुंचा तो खुला राज।

कोरबा (ट्रैक सिटी)/ शहर के हाउसिंग बोर्ड रामपुर कॉलोनी में बुलेट चोरी के एक मामले का खुलासा बेहद चौंकाने वाले तरीके से हुआ है। करीब दो साल पहले चोरी हुई बुलेट को कथित तौर पर उसका आरोपी लगातार चलाता रहा, लेकिन इस दौरान पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। दिलचस्प बात यह है कि चोरी की बुलेट का राज किसी पुलिस जांच के दौरान नहीं, बल्कि उस समय खुला, जब वाहन खराब होने के बाद उसे सर्विसिंग कराने के लिए एजेंसी ले जाया गया। एजेंसी के कर्मचारियों को वाहन के नंबर पर संदेह हुआ और उनकी छानबीन के बाद पूरे मामले की जानकारी पुलिस तक पहुंची।

मामला कोरबा जिले के सिविल लाइन थाना क्षेत्र का है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हाउसिंग बोर्ड रामपुर कॉलोनी के एक ब्लॉक से वर्ष 2024 में बुलेट चोरी हुई थी। इस संबंध में थाने में रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई थी। बताया जा रहा है कि चोरी की गई बुलेट को कॉलोनी के ही 15 नंबर ब्लॉक में रहने वाला एक युवक कथित तौर पर इस्तेमाल कर रहा था। इस तरह चोरी की वारदात के बाद करीब दो साल तक वाहन का उपयोग किए जाने की बात सामने आई है।

इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब बुलेट खराब हो गई। बताया जा रहा है कि आरोपी ने अपने एक दोस्त की मदद से वाहन का नंबर बदल दिया और उसे मरम्मत तथा सर्विसिंग के लिए एजेंसी पहुंचा दिया। वहां मौजूद कर्मचारियों को वाहन के नंबर को लेकर संदेह हुआ। इसके बाद उन्होंने बुलेट की जांच की। जांच के दौरान वाहन पर दर्ज नंबर के डुप्लीकेट होने की बात सामने आई, जबकि चेसिस नंबर और इंजन नंबर सही पाए गए। इसी संदेह के आधार पर एजेंसी के कर्मचारियों ने पुलिस को सूचना दी। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए कथित आरोपी को पकड़ लिया।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2024 में चोरी हुई बुलेट की रिपोर्ट दर्ज होने के बावजूद यदि वाहन इतने लंबे समय तक शहर में इस्तेमाल होता रहा, तो इसकी जानकारी पुलिस को पहले क्यों नहीं मिल सकी? क्या चोरी के वाहनों की तलाश और उनकी पहचान के लिए की जाने वाली जांच प्रभावी तरीके से हो रही है? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब पुलिस की विस्तृत जांच और आधिकारिक जानकारी से ही मिल सकेगा।

घटना के करीब दो दिन बाद भी मामले की पूरी कहानी मीडिया के सामने स्पष्ट रूप से नहीं आ सकी है। आरोपी ने बुलेट का नंबर कब और किस तरह बदला, उसके दोस्त की इस पूरे प्रकरण में क्या भूमिका रही और चोरी के वाहन का पता लगाने के लिए पुलिस ने पहले क्या कार्रवाई की थी, इन बिंदुओं पर विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है।

इस मामले में एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि चोरी के वाहनों का पता लगाने में कई बार आम नागरिकों, वाहन एजेंसियों और उनके कर्मचारियों की सतर्कता अहम भूमिका निभाती है। यदि एजेंसी के कर्मचारियों को नंबर पर संदेह नहीं होता, तो संभव है कि चोरी की बुलेट का मामला और लंबे समय तक सामने नहीं आता। अब देखना होगा कि सिविल लाइन पुलिस इस प्रकरण में जांच के दौरान किन तथ्यों का खुलासा करती है और चोरी के वाहन के इस्तेमाल से जुड़े अन्य पहलुओं पर क्या कार्रवाई करती है।

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