आलेख

सुनने को तरस गए घरेलू नाम.. बदलते दौर में रिश्तों की मिठास और संवाद का संकट

आज के आधुनिक और तकनीक-प्रधान युग में जीवन की रफ्तार जितनी तेज हुई है, उतनी ही तेजी से हमारे पारिवारिक रिश्तों की आत्मीयता भी कम होती दिखाई दे रही है। कभी घर-आंगन में गूंजने वाले घरेलू नाम—जैसे दद्दा, काका, बऊ, अम्मा, बाबूजी, भैया, दीदी, चाचा, ताऊ, मामी, फूफा, नानी और दादी—आज सुनने को तरस गए हैं। इन नामों में केवल संबोधन नहीं, बल्कि अपनापन, सम्मान, स्नेह और संस्कारों की पूरी दुनिया बसती थी।
घरेलू नामों में छिपी थी रिश्तों की गर्माहट
एक समय था जब परिवार का हर सदस्य किसी विशेष घरेलू नाम से पहचाना जाता था। बच्चे अपने पिता को बाबूजी या बापू कहते थे, मां को अम्मा या माई। दादा-दादी और नाना-नानी के लिए भी अलग-अलग आत्मीय संबोधन होते थे। इन शब्दों को सुनते ही मन में प्रेम, सम्मान और सुरक्षा का भाव जाग उठता था।
घरेलू नाम केवल पहचान का माध्यम नहीं थे, बल्कि परिवार की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा थे। ये नाम पीढ़ियों को जोड़ते थे और रिश्तों को मजबूती प्रदान करते थे।
आधुनिकता की दौड़ में खोते रिश्ते
समय के साथ जीवनशैली में बड़े बदलाव आए हैं। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा है और व्यस्तता ने लोगों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। अब बच्चों के लिए दादा-दादी के साथ समय बिताना दुर्लभ होता जा रहा है।
आज कई घरों में “मम्मी-डैडी” और “अंकल-आंटी” जैसे सामान्य संबोधन प्रचलित हो गए हैं। धीरे-धीरे स्थानीय बोली और घरेलू नामों का प्रयोग कम होता जा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्तों की वह आत्मीयता भी कमजोर पड़ रही है जो कभी भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी ताकत थी।
मोबाइल ने बढ़ाई दूरी
तकनीक ने सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन संवाद का स्वरूप भी बदल दिया है। पहले शाम होते ही परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर दिनभर की बातें साझा करते थे। अब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। घर में साथ रहते हुए भी संवाद कम होता जा रहा है।
बच्चे अपने दादा-दादी की कहानियों और अनुभवों से दूर होते जा रहे हैं। रिश्तों की जगह अब सोशल मीडिया के आभासी संबंध लेते जा रहे हैं। ऐसे में घरेलू नामों की मधुरता और उनसे जुड़ी भावनाएं धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं।
भाषा और संस्कृति पर भी प्रभाव
घरेलू नामों का लुप्त होना केवल संबोधनों का बदलना नहीं है, बल्कि यह हमारी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के कमजोर होने का संकेत भी है। हर क्षेत्र की अपनी विशिष्ट बोली और पारिवारिक संबोधन होते हैं, जो उस समाज की पहचान होते हैं।
जब बच्चे इन शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इनके अर्थ और महत्व से भी अनजान हो जाएंगी। इससे हमारी सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक पहचान को नुकसान पहुंच सकता है।
फिर से लौटानी होगी आत्मीयता
परिवारों में संवाद बढ़ाने और घरेलू नामों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। बच्चों को अपने रिश्तों की पहचान और उनके महत्व के बारे में बताया जाना चाहिए। दादा-दादी, नाना-नानी और परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताने की परंपरा को फिर से मजबूत करना होगा।
स्कूलों, सामाजिक संगठनों और परिवारों को मिलकर स्थानीय भाषा, संस्कृति और पारंपरिक संबोधनों के संरक्षण की दिशा में प्रयास करने चाहिए। जब बच्चे प्रेमपूर्वक “दादी”, “नानी”, “काका” या “बऊ” कहकर पुकारेंगे, तभी रिश्तों की वह खोती हुई मिठास वापस लौट सकेगी।

घरेलू नाम केवल शब्द नहीं हैं, वे हमारे संस्कारों, भावनाओं और पारिवारिक मूल्यों की धरोहर हैं। बदलते समय के साथ आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन अपनी जड़ों और रिश्तों की आत्मीयता को भूल जाना उचित नहीं। यदि हमें परिवार और समाज को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाए रखना है, तो घरेलू नामों की उस मधुर परंपरा को फिर से जीवित करना होगा, जो कभी भारतीय जीवन की सबसे सुंदर पहचान हुआ करती थी।
“जब घरों में फिर से अम्मा, बाबूजी, दद्दा और दादी की आवाजें गूंजेंगी, तभी रिश्तों की खोई हुई मिठास भी लौटेगी।”

Editor in chief | Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button