कोरबा

जब कलेक्टर-एसपी ने थामा माइक.. तो सुरों में ढल गई विदाई की शाम…

कलेक्टर कुणाल दुदावत और एसपी सिद्धार्थ तिवारी ने गीत से जीता दिल..

 

कोरबा (ट्रैक सिटी)। आईएएस और आईपीएस की कठिन परीक्षा पास कर सेवा में आने के बाद जिंदगी अक्सर एक तयशुदा और बेहद व्यस्त टाइम टेबल में सिमट जाती है। सुबह से देर शाम तक बैठकों, निरीक्षणों, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और जनसेवा से जुड़े कामों के बीच फुर्सत के पल जैसे बहुत पीछे छूट जाते हैं।
ऐसे में जब कभी इन अधिकारियों को अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ पल निकालकर सहज होने का अवसर मिलता है, तो उनकी शख्सियत का एक ऐसा पहलू सामने आता है, जिसे आमतौर पर लोग देख नहीं पाते।
लोग अक्सर मान लेते हैं कि सिविल सेवा परीक्षा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले कलेक्टर और एसपी की दुनिया सिर्फ फाइलों, बैठकों और किताबों तक सीमित होगी। लेकिन हकीकत यह है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के पीछे एक संवेदनशील इंसान भी होता है, जिसके भीतर कला, संगीत और भावनाओं के कई रंग छिपे होते हैं।
इन छिपे हुए हुनर को देखने का सबसे खूबसूरत अवसर अक्सर तब आता है, जब कोई अधिकारी अपने कार्यकाल के बाद विदा होता है। विदाई की उस बेला में माहौल औपचारिक कम और आत्मीय ज्यादा हो जाता है। वर्षों की साथ-साथ काम करने की यादें, अपनापन और बिछड़ने की कसक माहौल को भावुक कर देती है।
कोरबा में भी कुछ ऐसा ही हुआ।
जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी दिनेश नाग की विदाई के अवसर पर सजी एक भावुक शाम में प्रशासनिक गलियारों का माहौल अचानक सुरों से भर उठा। मंच पर जब कलेक्टर श्री कुणाल दुदावत और पुलिस अधीक्षक श्री सिद्धार्थ तिवारी ने माइक संभाला तो शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि गंभीर प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच ये दोनों अधिकारी इतने खूबसूरत अंदाज में गीत भी गा सकते हैं।
दोनों अधिकारियों ने मशहूर गीत “चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा न कहना…” को अपनी आवाज दी।
गीत के बोल जैसे उस शाम के भावों को ही बयां कर रहे थे। एक तरफ विदाई की उदासी थी, तो दूसरी तरफ साथ बिताए पलों की खूबसूरत यादें। सुरों के साथ भावनाएं भी जुड़ती चली गईं और देखते ही देखते माहौल तालियों से गूंज उठा।
यह सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि साथ काम करने वाले साथियों के बीच बने रिश्तों, आत्मीयता और यादों को महसूस करने का एक खूबसूरत पल था।
कुर्सी और पद की औपचारिकता से दूर उस शाम कलेक्टर और एसपी भी बिल्कुल सहज नजर आए…एक साथी की विदाई में शामिल दो संवेदनशील इंसान, जो अपने सुरों के जरिए कह रहे थे कि अधिकारी बदल सकते हैं, जिम्मेदारियां बदल सकती हैं, जगह बदल सकती है… लेकिन साथ बिताए अच्छे पल और उनसे जुड़ी यादें हमेशा दिल में रहती हैं।
शायद यही प्रशासनिक जीवन का सबसे मानवीय चेहरा है।
दिनभर फाइलों और जिम्मेदारियों के बीच रहने वाले ये अधिकारी जब कभी सुर छेड़ते हैं, तो पता चलता है कि आईएएस और आईपीएस की पहचान सिर्फ उनकी कुर्सी और पद से नहीं होती, उनके भीतर भी एक कलाकार, एक संवेदनशील मन और भावनाओं से भरा इंसान मौजूद होता है।
और उस शाम कोरबा ने इसी खूबसूरत अंदाज को महसूस किया..
सुरों में सजी विदाई, आंखों में यादें और दिल में बसता एक गीत…
“चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना…
कभी अलविदा न कहना…

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