कोरबा (ट्रैक सिटी) कोरबा शहर में खिलाड़ियों को बेहतर खेल सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कई निजी एवं सार्वजनिक उपक्रमों के खेल मैदान मौजूद हैं। इन्हीं में वार्ड क्रमांक 3, साकेत नगर स्थित प्रियदर्शिनी इंदिरा स्टेडियम का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। कभी राष्ट्रीय पर्वों से लेकर राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं का प्रमुख केंद्र रहा यह स्टेडियम अब सुविधाओं और रखरखाव की कमी को लेकर सवालों के घेरे में है।
कभी इसी मैदान में स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन के साथ-साथ विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं आयोजित होती थीं। लेकिन पिछले कई वर्षों से यहां ऐसे बड़े आयोजनों का सिलसिला लगभग थम गया है। आखिर इसके पीछे क्या कारण है, इसकी स्पष्ट जानकारी जिम्मेदार विभाग और अधिकारी ही दे सकते हैं। सवाल यह भी है कि जिस स्टेडियम का उपयोग कभी बड़े आयोजनों और खेल गतिविधियों के लिए किया जाता था, आज उसकी व्यवस्था इस स्थिति तक कैसे पहुंच गई?
खेल अकादमी का संचालन, लेकिन सुविधाओं पर सवाल
स्टेडियम के एक हिस्से का पिछले कुछ वर्षों से बालको द्वारा खेल अकादमी के रूप में संचालन किया जा रहा है। उद्देश्य निश्चित रूप से शहर और आसपास के बच्चों एवं खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है। लेकिन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उन्हें सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त रोशनी वाला वातावरण उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
स्थानीय लोगों और खिलाड़ियों के अनुसार स्टेडियम परिसर में कई स्थानों पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था नहीं है। शाम के समय अभ्यास, दौड़, वॉकिंग और व्यायाम के लिए पहुंचने वाले लोगों को अंधेरे के बीच गतिविधियां करनी पड़ती हैं। ऐसे में मोबाइल की टॉर्च तक का सहारा लेने की स्थिति सामने आ रही है।
घास कटिंग और रखरखाव भी बना सवाल
मैदान की नियमित देखरेख और समय-समय पर घास की कटिंग जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर भी शिकायतें सामने आ रही हैं। मैदान का उपयोग खिलाड़ी, युवा और आम नागरिक नियमित रूप से करते हैं। इसके बावजूद यदि मैदान की स्थिति व्यवस्थित नहीं रखी जाती तो खेल गतिविधियों के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि दिनभर की व्यस्तता के बाद वे स्वास्थ्य बेहतर रखने के उद्देश्य से शाम को स्टेडियम पहुंचते हैं। कोई रनिंग करता है, कोई वॉकिंग, कोई योग और कोई व्यायाम। लेकिन पर्याप्त रोशनी और समुचित रखरखाव के अभाव में उन्हें जोखिम उठाकर अपनी गतिविधियां करनी पड़ रही हैं।
शिकायतों के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
स्थानीय लोगों के मुताबिक वार्ड पार्षद और नागरिकों की ओर से मुख्यमंत्री समस्या निराकरण के तहत भी स्टेडियम की अव्यवस्थाओं को लेकर शिकायत की गई है। इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने का आरोप लगाया जा रहा है।
यदि शिकायतें संबंधित अधिकारियों तक पहुंच चुकी थीं, तो उसके बाद क्या कार्रवाई की गई? किस विभाग को क्या जिम्मेदारी दी गई? मैदान की रोशनी, सफाई, घास कटिंग और अन्य व्यवस्थाओं के लिए कितना बजट निर्धारित है? इन सवालों का जवाब भी जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
जिम्मेदारी तय करने के बजाय एक-दूसरे पर आरोप
सबसे बड़ा सवाल स्टेडियम की जिम्मेदारी को लेकर खड़ा हो रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि निगम के अधिकारियों, स्टेडियम प्रबंधन और खेल विभाग से संपर्क करने पर स्पष्ट जवाब मिलने के बजाय जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने की स्थिति दिखाई देती है।
यदि स्टेडियम नगर निगम के अधीन है तो उसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की है? यदि किसी हिस्से का संचालन बालको द्वारा किया जा रहा है तो उस हिस्से के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? और खेल गतिविधियों से जुड़ी व्यवस्थाओं के लिए जिला खेल अधिकारी की भूमिका क्या है? इन सवालों पर संबंधित विभागों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
टैक्स देने वाली जनता पूछ रही—सुविधाएं आखिर कहां हैं?
शहर के नागरिक नगर निगम सहित विभिन्न माध्यमों से नियमित रूप से कर और शुल्क का भुगतान करते हैं। ऐसे में उनका यह सवाल पूरी तरह स्वाभाविक है कि सार्वजनिक उपयोग की महत्वपूर्ण खेल सुविधा का उचित रखरखाव आखिर क्यों नहीं हो पा रहा है।
एक ओर सरकार खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने, युवाओं को खेलों से जोड़ने और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर शहर के प्रमुख स्टेडियम में पर्याप्त रोशनी, मैदान की नियमित देखरेख और मूलभूत सुविधाओं की कमी का आरोप सामने आना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों से उपेक्षा तक का सफर क्यों?
इंदिरा स्टेडियम कभी शहर की पहचान और बड़े आयोजनों का केंद्र रहा है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पिछले वर्षों में यहां बड़े राष्ट्रीय पर्वों और खेल आयोजनों में कमी क्यों आई। क्या स्टेडियम की तकनीकी या संरचनात्मक स्थिति इसका कारण है? क्या रखरखाव के लिए पर्याप्त बजट नहीं है? या फिर विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है?
इन सवालों का जवाब केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और जिम्मेदारी तय करके सामने आना चाहिए।
टोर्च की रोशनी में दौड़ता हुआ युवक
प्रशासन से अपेक्षा—दावा नहीं, व्यवस्था दिखाई दे
शहर के खिलाड़ियों और नागरिकों की मांग है कि इंदिरा स्टेडियम की वास्तविक स्थिति का संबंधित विभाग संयुक्त निरीक्षण करे। मैदान की स्थिति, प्रकाश व्यवस्था, विद्युत व्यवस्था, घास कटिंग, स्वच्छता, सुरक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं का परीक्षण कर कमियों को दूर किया जाए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि स्टेडियम के किन हिस्सों की जिम्मेदारी नगर निगम, खेल विभाग और बालको प्रबंधन की है। जिम्मेदारी स्पष्ट होने के बाद यदि व्यवस्था में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
क्योंकि जिस मैदान में शहर के खिलाड़ी अपने भविष्य को निखारने पहुंचते हैं, वहां यदि उन्हें अंधेरे, अव्यवस्था और असुरक्षित माहौल से जूझना पड़े, तो सवाल सिर्फ स्टेडियम की व्यवस्था का नहीं, बल्कि खेल प्रतिभाओं के भविष्य और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली का भी है।

