कोरबा

त्योहारी भीड़ से पहले जनप्रतिनिधियों की अग्निपरीक्षा

 

सड़कें जाम होने के बाद सक्रियता दिखाने से बेहतर है कि अभी प्रशासन को जगाया जाए

कोरबा (ट्रैक सिटी)। त्योहार आएंगे, बाजारों में भीड़ बढ़ेगी, सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ेगा और फिर वही सवाल सामने खड़ा होगा—जाम से शहर को कैसे बचाया जाए? सवाल नया नहीं है। नया केवल इतना होना चाहिए कि इस बार समस्या बढ़ने का इंतजार न किया जाए।
यहीं से जनप्रतिनिधियों की भूमिका और उनकी जवाबदेही महत्वपूर्ण हो जाती है। जनता ने उन्हें केवल उद्घाटन, कार्यक्रमों और शिकायतों तक सीमित रहने के लिए नहीं चुना है। शहर की रोजमर्रा की परेशानियों को प्रशासन के सामने मजबूती से रखना और उनके समाधान के लिए पहल करना भी उनकी जिम्मेदारी है। यातायात व्यवस्था ऐसा ही एक गंभीर मुद्दा है, जिसे त्योहारों की भीड़ बढ़ने से पहले प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
जाम लगने के बाद कार्रवाई क्यों?
बाजारों में त्योहारों के दौरान भीड़ बढ़ेगी, यह किसी भविष्यवाणी का विषय नहीं है। यह हर साल होने वाली स्थिति है। फिर भी अक्सर व्यवस्था तब सक्रिय होती है जब सड़कें जाम हो चुकी होती हैं और आम नागरिक घंटों परेशान हो चुका होता है।
क्या इस बार भी यही इंतजार किया जाएगा?
जनप्रतिनिधियों को अभी से प्रशासन, यातायात पुलिस, नगर निगम और व्यापारी संगठनों के साथ बैठक की पहल करनी चाहिए। प्रमुख बाजारों की स्थिति का मौके पर जायजा लेकर यह तय होना चाहिए कि कहां पार्किंग होगी, कहां नो-पार्किंग व्यवस्था रहेगी, किन मार्गों पर अतिरिक्त यातायात दबाव आएगा और जरूरत पड़ने पर किन वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल किया जाएगा।
जनप्रतिनिधि सिर्फ आवाज उठाने वाले नहीं, पहल करने वाले बनें
किसी सड़क पर जाम लगा तो सोशल मीडिया या बयान के जरिए चिंता जताना आसान है। लेकिन असली जनप्रतिनिधित्व तब दिखाई देगा, जब समस्या सामने आने से पहले समाधान की पहल की जाए।
वार्ड और बाजार स्तर की समस्याओं को लेकर जनप्रतिनिधियों को संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगना चाहिए। यदि पार्किंग की कमी है तो उसके लिए स्थान तलाशने की पहल हो। यदि अतिक्रमण समस्या है तो प्रशासन के साथ कार्रवाई की योजना बने। यदि बाजार की सड़क पर वाहनों का दबाव है तो यातायात प्रबंधन की वैकल्पिक व्यवस्था तैयार हो।
त्योहार खत्म होने के बाद समीक्षा बैठक से ज्यादा जरूरी त्योहार शुरू होने से पहले तैयारी बैठक है।
व्यापारियों को भी साथ लेना होगा
व्यापारियों के लिए त्योहारी सीजन कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण समय हो सकता है। लेकिन बाजार में ग्राहक तभी सहजता से पहुंचेंगे, जब वहां यातायात व्यवस्था सुचारु होगी। इसलिए जनप्रतिनिधियों को व्यापारी संगठनों के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करने की पहल करनी चाहिए कि दुकानों के सामने सड़क पर सामान न फैले, वाहन अनियंत्रित ढंग से खड़े न हों और बाजार की सड़कें व्यापार के दबाव में पूरी तरह अवरुद्ध न हों।
जनता को राहत चाहिए, आश्वासन नहीं
आम नागरिक को यह फर्क नहीं पड़ता कि जाम की जिम्मेदारी किस विभाग की है। उसे सड़क पर चलने के लिए जगह चाहिए, वाहन खड़ा करने के लिए सुरक्षित स्थान चाहिए और त्योहार के दौरान घंटों जाम में फंसने से राहत चाहिए।
इसलिए अब गेंद जनप्रतिनिधियों के पाले में है। वे चाहें तो इस मुद्दे को प्राथमिकता देकर प्रशासन को समय रहते सक्रिय कर सकते हैं। वे चाहें तो व्यापारियों और अधिकारियों को एक मंच पर लाकर व्यावहारिक समाधान निकाल सकते हैं।
लेकिन यदि त्योहारों के दौरान सड़कें जाम होती हैं और उसके बाद वही पुराने सवाल उठते हैं, तो सवाल केवल यातायात व्यवस्था पर नहीं होगा—सवाल समय रहते पहल न करने वाले जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी उठेगा।
अब पहल की जरूरत है, इंतजार की नहीं
त्योहारी भीड़ कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं है। इसकी तैयारी पहले से की जा सकती है। इसलिए जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे अभी आगे आएं, प्रशासन से बात करें, संयुक्त बैठक बुलाने की पहल करें और बाजारवार यातायात कार्ययोजना तैयार करवाएं।
त्योहारों में शहर की सड़कें उत्सव की गवाह बनें, अव्यवस्था और जाम की नहीं—इसके लिए पहल आज करनी होगी।
बड़ा सवाल यही है—क्या जनप्रतिनिधि इस बार भीड़ बढ़ने का इंतजार करेंगे, या उससे पहले जनता की परेशानी को अपना मुद्दा बनाकर प्रशासन को सक्रिय करेंगे?

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