आलेख

गायों को हाँकते ग्वाले की आवाज़ और मेरे बचपन का गाँव

सफर के दौरान आज गायों को हाँकते हुए एक ग्वाले को देखा, तो मन अचानक वर्षों पीछे लौट गया। ऐसा लगा, जैसे किसी ने मेरे भीतर दबी बचपन की यादों को धीरे से छू दिया हो। आँखों के सामने एक-एक करके वे सारे दृश्य उभरने लगे, जिन्हें समय के साथ मैं कहीं पीछे छोड़ आया था। नाना-नानी का घर, गर्मी की छुट्टियाँ, हम सभी भाई-बहनों की धमाचौकड़ी, आँगन में बिछी खाटें और सुबह-सुबह गायों के रंभाने के साथ सुनाई देती ग्वाले की पुकार… सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।

कितना अजीब है न! जिंदगी में हम कितने आगे निकल आते हैं, कितने नए लोगों से मिलते हैं, कितने नए शहर देखते हैं, लेकिन मन का एक कोना हमेशा वहीं ठहरा रहता है, जहाँ हमने अपना बचपन बिताया होता है। कभी कोई पुरानी खुशबू, कोई जानी-पहचानी आवाज या कोई छोटा-सा दृश्य उस कोने का दरवाजा खोल देता है। आज मेरे साथ भी यही हुआ।

गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही हमारे भीतर एक अलग ही उत्साह भर जाता था। हम सभी भाई-बहन नाना-नानी के घर गाँव जाया करते थे। उन दिनों गाँव जाने का मतलब केवल छुट्टियाँ बिताना नहीं था, बल्कि अपनी एक छोटी-सी दुनिया में लौटना था। वह दुनिया, जहाँ न किसी बात की जल्दी थी, न किसी जिम्मेदारी का बोझ और न ही भविष्य को लेकर कोई चिंता। बस हम थे, हमारा बचपन था और नाना-नानी का प्यार भरा घर।

नाना-नानी के घर में वैसे तो रहने के लिए काफी जगह थी, लेकिन हम सबको घर के अंदर सोने के बजाय खुले आँगन में खाट बिछाकर सोना ज्यादा अच्छा लगता था। आज सोचता हूँ तो लगता है कि उस खुले आँगन में ऐसा क्या था, जो हमें घर के कमरों से ज्यादा अपना लगता था? शायद खुला आसमान, रात की ठंडी हवा, तारों को निहारने की आजादी और सबसे बढ़कर, एक-दूसरे के साथ होने का सुख।

शाम होते ही आँगन में खाटें बिछ जाती थीं। हम सब अपनी-अपनी खाट पर बैठकर बातें करते, हँसते, एक-दूसरे को छेड़ते और दिनभर की शरारतों का हिसाब-किताब लगाते। कभी किसी बात पर ठहाके लगते, तो कभी छोटी-सी नोकझोंक भी हो जाती। लेकिन उन सबमें भी एक अपनापन था। रात गहराती जाती और हमारी बातें चलती रहतीं। फिर न जाने कब आँख लग जाती और हम खुले आकाश के नीचे नींद की दुनिया में खो जाते।

उस समय शायद मुझे यह एहसास भी नहीं था कि ये साधारण-से पल एक दिन मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगे।

सुबह की शुरुआत भी कितनी निराली होती थी! आँख खुलती तो आँगन में सुनहरी धूप उतरने लगी होती। सुबह की ठंडी हवा चेहरे को छूती और आसपास का वातावरण एक अजीब-सी ताजगी से भरा रहता। गायों के रंभाने की आवाज सुनाई देती। कहीं चिड़ियाँ चहचहा रही होतीं और इसी बीच दूर से ग्वाले की आवाज कानों में पड़ती, जो गायों को हाँकते हुए अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहा होता।

गायों के गले में बँधी घंटियों की आवाज और ग्वाले की पुकार मिलकर सुबह का ऐसा संगीत रचते थे, जिसे आज भी याद करता हूँ तो मन को एक अनकहा सुकून मिलता है। उस समय शायद मैं इन आवाजों की खूबसूरती को समझता भी नहीं था। वे हमारी सुबह का हिस्सा थीं, रोजमर्रा की जिंदगी का एक सामान्य दृश्य। लेकिन आज समझ आता है कि वही तो गाँव की असली पहचान थी, वही उस जीवन की सहजता थी, जिसकी कमी आज अक्सर महसूस होती है।

गाँव की सुबह में कोई बनावट नहीं थी। सब कुछ अपने स्वाभाविक रूप में था। सूरज का निकलना, हवा का चलना, पशुओं का अपने रास्ते पर जाना और लोगों का अपने दिन की शुरुआत करना। जिंदगी बहुत सरल थी और शायद इसी सरलता में उसका सबसे बड़ा आनंद छिपा था।

नाना-नानी के घर बिताए वे दिन मुझे इसलिए भी याद आते हैं, क्योंकि वहाँ हर छोटी चीज में खुशी मिल जाती थी। हम भाई-बहनों का साथ ही अपने आप में एक उत्सव था। न मनोरंजन के लिए किसी बड़ी व्यवस्था की जरूरत थी, न खुश होने के लिए किसी खास अवसर की। हम अपने आसपास की दुनिया में ही खुशियाँ खोज लेते थे। कभी खेलते-कूदते, कभी गाँव की गलियों में घूमते और कभी बस एक-दूसरे के साथ बैठकर बातें करते हुए दिन बीत जाता था।

अब जब अपनी जिंदगी की ओर देखता हूँ, तो महसूस होता है कि समय ने बहुत कुछ बदल दिया है। हमारी दिनचर्या बदल गई, प्राथमिकताएँ बदल गईं और जीवन की रफ्तार भी पहले से कहीं तेज हो गई है। अब सुबह आँख खुलते ही मन में दिनभर के कामों की सूची घूमने लगती है। समय का हिसाब रखना पड़ता है, जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं और कई बार तो अपने लिए कुछ पल निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

ऐसे में जब कभी गाँव की वे सुबहें याद आती हैं, तो मन अनायास ही ठहरने लगता है। लगता है, काश! जिंदगी से कुछ पल उधार लेकर फिर उसी आँगन में लौट पाता। वही खाट होती, वही खुला आसमान होता, वही सुबह की सुनहरी धूप होती और दूर से आती ग्वाले की आवाज होती। मैं फिर से उसी बेफिक्री के साथ आँखें खोलता, जैसे उस समय मेरे सामने पूरी जिंदगी पड़ी हो और मुझे कहीं पहुँचने की कोई जल्दी न हो।

कभी-कभी सोचता हूँ कि बचपन में हम कितने अनजान थे उस सुख से, जिसे आज याद करके मन भर आता है। तब हमें लगता था कि छुट्टियाँ तो हर साल आएँगी, नाना-नानी का घर तो वहीं रहेगा और हम सभी भाई-बहन फिर मिलकर ऐसे ही दिन बिताएँगे। लेकिन धीरे-धीरे समय अपनी चाल चलता रहा। बचपन पीछे छूटता गया, हम बड़े होते गए और जिंदगी हमें अपनी-अपनी दिशाओं में ले गई।

आज वे दिन लौटकर नहीं आ सकते, लेकिन उनकी यादें मेरे भीतर आज भी उतनी ही जीवंत हैं। उन यादों में नाना-नानी का घर केवल एक घर नहीं, बल्कि मेरे जीवन का वह हिस्सा है, जहाँ मैंने अपनापन महसूस किया, रिश्तों की गर्माहट जानी और छोटी-छोटी बातों में खुश होना सीखा।

आज गायों को हाँकते ग्वाले को देखकर मुझे एहसास हुआ कि कुछ आवाजें केवल कानों तक नहीं पहुँचतीं, वे सीधे दिल में उतरती हैं। वे हमें उन जगहों पर ले जाती हैं, जहाँ हमारा मन आज भी घर जैसा महसूस करता है। ग्वाले की वह पुकार मेरे लिए केवल गाँव की एक परिचित आवाज नहीं थी; वह मेरे बीते हुए बचपन की दस्तक थी।

और सच कहूँ, तो उस एक दृश्य ने मुझे कुछ पल के लिए फिर वही बच्चा बना दिया, जो गर्मी की छुट्टियाँ बिताने नाना-नानी के घर आया करता था, जिसे आँगन में खाट बिछाकर सोना पसंद था और जिसकी सुबह गायों के रंभाने तथा ग्वाले की आवाज के साथ शुरू होती थी।

आज समझ आता है कि जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल अक्सर उस समय साधारण लगते हैं, जब हम उन्हें जी रहे होते हैं। उनकी असली कीमत तब पता चलती है, जब वक्त उन्हें यादों में बदल चुका होता है।

शायद इसी का नाम बचपन है—एक ऐसा समय, जिसे हम वापस तो नहीं ला सकते, लेकिन जिसकी याद में उम्रभर लौटते रह सकते हैं।

और आज, गायों को हाँकते उस ग्वाले को देखकर, मेरा मन एक बार फिर उसी गाँव में ठहर गया है। उसी आँगन में, उन्हीं खाटों के बीच, नाना-नानी के उसी घर में… जहाँ मेरा बचपन आज भी कहीं चुपचाप मेरा इंतजार कर रहा है।

Editor in chief | Website | + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button