कोरबा

जया एकादशी का पुण्य पर्व 29 जनवरी को, व्रत से मिलता है पापों व पिशाच योनि से मुक्ति का दिव्य फल।

WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.04 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.05 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.08 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.05 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.04 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.05
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.07 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.06
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.06 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.07
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.07 (1)

कोरबा (ट्रैक सिटी)/  माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे जया एकादशी के नाम से जाना जाता है, इस वर्ष 29 जनवरी 2026, गुरुवार को श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार यह एकादशी अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है, जिसका व्रत करने से मनुष्य को पूर्व जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है तथा भूत-प्रेत-पिशाच जैसी नीच योनियों से भी छुटकारा प्राप्त होता है।

WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.04
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.08 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.07 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.39.07

धार्मिक पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का आरंभ 28 जनवरी 2026, बुधवार को सायं 04:35 बजे से होगा तथा समापन 29 जनवरी 2026, गुरुवार को मध्यान्ह 01:55 बजे होगा। जया एकादशी का व्रत 29 जनवरी, गुरुवार को रखा जाएगा, जबकि व्रत का पारण 30 जनवरी 2026, शुक्रवार को प्रातः 06:41 बजे से 08:56 बजे तक शुभ रहेगा।

जया एकादशी का धार्मिक महत्व

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जया एकादशी का महत्व बताते हुए कहा कि यह व्रत विशेष रूप से पिशाच, प्रेत और भूत योनि से मुक्ति प्रदान करने वाला है। इस दिन विधिपूर्वक भगवान श्री विष्णु की पूजा-अर्चना और उपवास करने से मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

 जया एकादशी व्रत कथा का सार

कथा के अनुसार, स्वर्गलोक के नंदन वन में एक उत्सव के दौरान गंधर्व माल्यवान और गंधर्व कन्या पुष्यवती अपने कर्तव्य से विचलित हो गए, जिससे सभा की मर्यादा भंग हुई। इस अपराध से क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने दोनों को श्राप दे दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पृथ्वी लोक में पिशाच योनि में जीवन व्यतीत करना पड़ा।

हिमालय के वन क्षेत्र में कष्टमय जीवन जीते हुए, संयोगवश माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन दोनों ने उपवास किया, संयम रखा और रात्रि जागरण के साथ अपने कृत्य पर पश्चाताप किया। प्रभु की कृपा से उनका अज्ञानवश किया गया यह एकादशी व्रत सफल हुआ और मृत्यु के पश्चात उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति प्राप्त हुई। वे पुनः दिव्य गंधर्व और अप्सरा रूप में स्वर्गलोक को प्राप्त हुए।

व्रत का फल

जया एकादशी का व्रत करने से— पूर्व जन्मों के पाप कर्मों से मुक्ति भूत, प्रेत, पिशाच जैसी नीच योनियों से उद्धार मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धि भगवान श्री विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

धार्मिक विद्वानों के अनुसार यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है, जो जीवन में मानसिक कष्ट, भय या नकारात्मकता से ग्रसित रहते हैं।

*नाड़ीवैद्य पंडित डॉ.नागेंद्र नारायण शर्मा*

 

Editor in chief | Website |  + posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button