कोरबा(ट्रैक सिटी)। बरसात का मौसम आते ही जहां जहरीले जीव-जंतुओं के निकलने का खतरा बढ़ गया है, वहीं जगह-जगह जमा पानी अब मच्छरों के लिए भी मानो ‘सरकारी इंतजाम वाला घर’ बन गया है। नालियों, गड्ढों और खाली प्लॉटों में ठहरा पानी मच्छरों के पनपने का कारण बन रहा है, लेकिन नगर निगम की मच्छर नियंत्रण व्यवस्था को लेकर नागरिकों में सवाल उठने लगे हैं।
नगर निगम हर वर्ष नागरिकों से विभिन्न करों के माध्यम से भारी-भरकम राशि वसूल करता है। बदले में अपेक्षा रहती है कि साफ-सफाई, जलभराव की रोकथाम और मच्छर नियंत्रण जैसी मूलभूत सुविधाएं प्रभावी तरीके से उपलब्ध हों। लेकिन सवाल यह है कि जब मच्छर आंखों के सामने उड़ रहे हैं, तो निगम की फॉगिंग मशीन आखिर कहां घूम रही है?
नागरिकों का कहना है कि कई इलाकों में न तो नियमित रूप से फॉगिंग दिखाई दे रही है और न ही मच्छररोधी दवा का प्रभावी छिड़काव नजर आ रहा है। दूसरी ओर, पूछने पर अक्सर यह दावा सामने आता है कि वार्डों में प्रतिदिन दवा का छिड़काव किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि वास्तव में रोजाना छिड़काव हो रहा है तो मच्छरों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती क्यों दिखाई दे रही है?
कागजों में फॉगिंग या जमीन पर?
क्या दवा का छिड़काव सिर्फ कागजों और रिपोर्टों तक सीमित है? क्या फॉगिंग मशीनें केवल रिकॉर्ड में ही वार्डों का दौरा कर रही हैं? और यदि मैदान में नियमित कार्रवाई हो रही है तो उसका असर जमीन पर नजर क्यों नहीं आ रहा?
बरसात में मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में नगर निगम को केवल कागजी कार्रवाई के बजाय जमीनी स्तर पर प्रभावी अभियान चलाने की जरूरत है। जलभराव वाले स्थानों को चिन्हित कर नियमित दवा छिड़काव और फॉगिंग कराई जानी चाहिए तथा इसकी निगरानी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अब सवाल सीधा है—टैक्स जनता से वसूला जा रहा है, तो मच्छरों से राहत देने की जिम्मेदारी किसकी है?
अगर मच्छर आंखों के सामने उड़ रहे हैं और फॉगिंग मशीन नजर नहीं आ रही, तो नागरिक पूछेंगे ही—आखिर निगम की मच्छर नियंत्रण व्यवस्था जमीन पर है या सिर्फ कागजों पर?
Leave a Reply

