आलेख

इसे किस्मत कहें या इत्तेफाक, वक्त ने फिर बचपन की गलियों तक पहुंचा दिया

सुबह एक ग्वाले को गायों को हाँकते देखा तो मन गांव की पुरानी यादों में खो गया। नाना-नानी के गांव और बचपन की स्मृतियों को लेकर एक लेख लिखा ही था कि उसी दिन किस्मत ने ऐसा संयोग रच दिया, जिसने मुझे उन्हीं गलियों में दोबारा पहुंचा दिया, जहां कभी मेरा बचपन हँसता-खेलता बड़ा हुआ था।

कभी-कभी जिंदगी ऐसे खूबसूरत संयोग रचती है, जिनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। सुबह की शुरुआत भी कुछ ऐसी ही हुई थी। सफर के दौरान सड़क पर एक ग्वाले को गायों को हाँकते हुए देखा तो मन अनायास ही अतीत की ओर लौट गया। गायों के पीछे-पीछे चलता वह ग्वाला मुझे अपने बचपन के उन दिनों में ले गया, जब गर्मी की छुट्टियां आते ही हम सभी भाई-बहनों के लिए नाना-नानी का गांव दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह बन जाया करता था।

उस दृश्य को देखकर मन में इतनी सारी यादें उमड़ पड़ीं कि मैंने अपने नाना-नानी के गांव, वहां बिताए बचपन के दिनों और उन अनमोल पलों को याद करते हुए एक लेख लिख डाला। तब मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस गांव की यादों को मैं शब्दों में पिरोया हूं, उसी गांव की गलियों में कुछ घंटों बाद मुझे फिर से घूमने का अवसर मिलने वाला है।

इसे किस्मत कहें या महज इत्तेफाक, लेकिन जिंदगी ने उसी दिन एक ऐसा खूबसूरत मोड़ लिया, जिसने बचपन की यादों को केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें एक बार फिर जीने का मौका दे दिया।

जब पिताजी ने अचानक गांव चलने की बात कही

सुबह लेख लिखने के बाद सफर जारी था। दिन अपने सामान्य क्रम में आगे बढ़ रहा था। तभी अचानक पिताजी ने गांव चलने की बात कही। उनकी यह बात सुनते ही मन में एक अलग ही उत्साह जाग उठा। वही गांव, जहां बचपन की न जाने कितनी यादें जुड़ी हुई हैं। वही गलियां, वही घर-आंगन और वही अपनापन, जिसकी खुशबू आज भी मन के किसी कोने में बसी हुई है।

कुछ ही देर में हम उस गांव की ओर बढ़ रहे थे, जिसकी यादों में मैं सुबह ही खोया हुआ था। यह किसी कहानी की तरह लग रहा था। सुबह जिस गांव को याद करते हुए लेख लिखा, दोपहर होते-होते उसी गांव की मिट्टी को फिर से महसूस करने का अवसर मिल गया।

गांव पहुंचने की खुशी के साथ मन में एक कसक भी थी। आज वहां नाना-नानी नहीं हैं। जिनके स्नेह और आशीर्वाद से बचपन की छुट्टियां इतनी यादगार बनती थीं, वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी यादें आज भी उस गांव की हवा, गलियों और घर-आंगन में कहीं न कहीं जीवित महसूस होती हैं।

नाना-नानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मामा-मामी और भाई-बहन आज भी वहीं रहते हैं। उन्हीं के बीच पहुंचकर लगा कि समय ने बहुत कुछ बदल दिया है, मगर रिश्तों की डोर आज भी हमें उसी मजबूती से बांधे हुए है।

वही गांव, लेकिन बदल गया उसका चेहरा

गांव की गलियों में कदम रखते ही मन अतीत और वर्तमान के बीच झूलने लगा। आंखों के सामने वर्तमान का गांव था, लेकिन मन बार-बार उस पुराने गांव को तलाश रहा था, जहां कभी बचपन की गर्मी की छुट्टियां बिताई थीं।

याद आता है कि पहले गांव में छोटे-छोटे मकान हुआ करते थे। मिट्टी और साधारण निर्माण वाले घर, खुले आंगन, आसपास का प्राकृतिक वातावरण और गलियों में पसरी सहजता ही गांव की पहचान हुआ करती थी। घरों के बीच एक अपनापन था। लोग एक-दूसरे को जानते थे, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे और छोटी-छोटी बातों में भी खुशियां तलाश लेते थे।

आज उसी गांव का स्वरूप काफी बदल चुका है। जहां पहले छोटे-छोटे मकान नजर आते थे, वहां अब बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गई हैं। बदलते समय के साथ गांव ने भी विकास की राह पकड़ी है। मकानों की बनावट बदली है, रहन-सहन बदला है और आसपास का परिवेश भी पहले जैसा नहीं रहा।

यह बदलाव देखकर मन में खुशी भी हुई कि गांव आगे बढ़ रहा है, लेकिन कहीं न कहीं पुरानी तस्वीर को खो देने का एक हल्का-सा दर्द भी महसूस हुआ। विकास जरूरी है, समय के साथ बदलाव भी स्वाभाविक है, मगर बचपन से जुड़ी जगहों को जब हम वर्षों बाद देखते हैं तो मन उन्हें उसी पुराने रूप में खोजने लगता है।

कई बार हम किसी जगह को नहीं, बल्कि उस जगह से जुड़े अपने बीते हुए समय को याद कर रहे होते हैं। शायद इसीलिए गांव की बदली हुई गलियों में घूमते हुए भी मेरा मन बार-बार उन्हीं पुराने दिनों में लौट रहा था।

अचानक पहुंचे तो मामा-मामी भी चौंक गए

हमारे अचानक गांव पहुंचने की उम्मीद शायद मामा-मामी ने भी नहीं की थी। हमें अपने सामने देखकर वे एक पल के लिए चौंक गए। अचानक हुई इस मुलाकात में हैरानी भी थी और अपनों को देखकर उमड़ने वाली खुशी भी।

कुछ मुलाकातें पहले से तय नहीं होतीं। न कोई औपचारिक योजना होती है और न ही कोई विशेष तैयारी। बस अचानक पहुंच जाना, अपनों के चेहरे पर मुस्कान देखना और उनके बीच कुछ पल बैठ जाना ही सबसे बड़ा सुख बन जाता है।

मामा-मामी के चेहरे पर हमें देखकर जो खुशी दिखाई दी, उसने इस यात्रा को और भी खास बना दिया। ऐसा लगा मानो लंबे समय बाद रिश्तों के बीच कुछ भूले-बिसरे पल फिर से जीवित हो उठे हों। गांव आने का उद्देश्य भले ही अचानक बना हो, लेकिन यहां पहुंचकर महसूस हुआ कि कभी-कभी बिना किसी योजना के किए गए सफर जिंदगी की सबसे यादगार यात्राएं बन जाते हैं।

अपनों के बीच बैठकर समय का अहसास भी कुछ अलग होता है। वहां न किसी जल्दबाजी की जरूरत होती है और न ही किसी दिखावे की। बस अपने लोग होते हैं, पुरानी यादें होती हैं और बातचीत के बीच कभी हंसी तो कभी बीते हुए दिनों की हल्की-सी उदासी।

आज नाना-नानी नहीं हैं, लेकिन मामा-मामी और भाई-बहनों को देखकर ऐसा लगा कि परिवार की वह पुरानी डोर अब भी कायम है, जो हमें अपने गांव और अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है।

गलियों में घूमते हुए फिर लौट आया बचपन

गांव की गलियों में घूमते हुए ऐसा लग रहा था जैसे समय ने कुछ देर के लिए मुझे पीछे धकेल दिया हो। मन उन दिनों को याद करने लगा, जब हम सभी भाई-बहन गर्मी की छुट्टियां बिताने नाना-नानी के घर आया करते थे।

घर में जगह की कमी नहीं थी, लेकिन हम सबका खुले आंगन में खाट लगाकर सोना अपने आप में एक अलग अनुभव हुआ करता था। रात का खुला आसमान, ठंडी हवा और परिवार के सदस्यों के बीच होने वाली बातचीत आज भी स्मृतियों में ताजा है। सुबह की सुनहरी धूप के साथ आंख खुलना, गांव के माहौल में दिन की शुरुआत करना और पूरे दिन भाई-बहनों के साथ खेलना—इन सबमें ऐसी खुशी मिलती थी, जिसे आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तलाशना मुश्किल हो गया है।

उस समय न हमारे पास मनोरंजन के इतने साधन थे और न ही जिंदगी को लेकर कोई बड़ी चिंता। छोटी-छोटी बातें ही हमारी खुशियों का कारण बन जाती थीं। छुट्टियों का मतलब था बेफिक्र होकर जीना, अपनों के साथ वक्त बिताना और हर दिन को किसी नए रोमांच की तरह महसूस करना।

आज जब उन्हीं गलियों से गुजरता हूं तो लगता है कि उस समय की हमारी दुनिया कितनी छोटी थी, लेकिन उस छोटी-सी दुनिया में खुशियां कितनी बड़ी थीं। आज जिंदगी में सुविधाएं बढ़ गई हैं, जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं, लेकिन बचपन की वह बेफिक्री और रिश्तों के बीच बिताया जाने वाला सहज समय शायद कहीं पीछे छूट गया है।

कुछ जगहें कभी पुरानी नहीं होतीं

वक्त का सबसे बड़ा सच यही है कि वह कभी रुकता नहीं। लोग बदल जाते हैं, घर बदल जाते हैं, गलियां बदल जाती हैं और कई बार पूरा परिवेश ही नया रूप ले लेता है। लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं, जिन्हें समय की धूल भी धुंधला नहीं कर पाती।

नाना-नानी का गांव मेरे लिए केवल एक गांव नहीं है। यह मेरे बचपन का हिस्सा है, परिवार के स्नेह की निशानी है और उन दिनों की यादों का घर है, जिन्हें मैं जीवन भर अपने साथ लेकर चलूंगा।

आज जब वहां से लौटने का समय आया तो मन में कई तरह के भाव थे। एक ओर गांव के बदलते स्वरूप को देखकर खुशी थी, दूसरी ओर नाना-नानी की अनुपस्थिति का एहसास भी था। उनके बिना गांव पहले जैसा तो नहीं रहा, लेकिन उनकी यादों ने आज भी उस जगह को मेरे लिए उतना ही खास बना रखा है।

सुबह एक ग्वाले को गायों को हाँकते देखकर शुरू हुआ यादों का सफर आखिरकार मुझे उसी गांव तक ले आया, जहां मेरा बचपन बीता था। सुबह जिस गांव को शब्दों में याद कर रहा था, शाम तक उसी गांव की गलियों में घूमकर उन यादों को फिर से महसूस कर रहा था।

अब सोचता हूं तो यह महज संयोग नहीं, जिंदगी का एक खूबसूरत उपहार लगता है। शायद कुछ जगहें हमें खुद बुलाती हैं। शायद कुछ रिश्ते हमें अपनी ओर खींचते हैं। और शायद कुछ यादें तब तक हमारा पीछा करती रहती हैं, जब तक हमें एक बार फिर उन पलों के करीब पहुंचने का अवसर नहीं मिल जाता।

इसे किस्मत कहें या इत्तेफाक, लेकिन आज जिंदगी ने मुझे यह एहसास जरूर करा दिया कि इंसान चाहे कितना भी आगे बढ़ जाए, उसका बचपन, उसकी जड़ें और अपनों से जुड़ी यादें हमेशा उसके भीतर जीवित रहती हैं।

गांव का चेहरा बदल सकता है, घरों की जगह बड़ी इमारतें खड़ी हो सकती हैं और वक्त अपने साथ बहुत कुछ ले जा सकता है, लेकिन नाना-नानी के आंगन में बिताए गए दिन, भाई-बहनों के साथ की गई शरारतें और अपनों के चेहरे पर मिलने वाली खुशी कभी पुरानी नहीं होती।

कुछ सफर हमें मंजिल तक पहुंचाने के लिए नहीं होते, बल्कि हमें उस इंसान से दोबारा मिलाने के लिए होते हैं, जो हम कभी हुआ करते थे।

आज का यह सफर भी कुछ ऐसा ही था—अपने अतीत से मुलाकात, रिश्तों की गर्माहट का एहसास और बचपन की उन गलियों में लौटने का अवसर, जहां आज भी मेरी अनगिनत यादें मेरा इंतजार कर रही थीं।

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