कोरबा (ट्रैक सिटी)। कोरबा शहर के पावर हाउस रोड स्थित बाइपास मार्ग (दुबई रोड) क्षेत्र में प्रस्तावित चौपाटी निर्माण को लेकर सीमांकन की प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। नगर पालिक निगम द्वारा करीब 5.52 एकड़ भूमि पर मल्टी-लेवल कार पार्किंग, फूड मार्केट, चौपाटी और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी परिसर विकसित करने का प्रस्ताव बताया गया है। इसके लिए 23 सितंबर को सीमांकन प्रस्तावित था। इसी बीच सीमांकन पर रोक लगाए जाने की खबर ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि संबंधित भूमि वास्तव में सिंचाई विभाग की शासकीय भूमि है और उसका उपयोग जनसुविधा एवं विकास कार्यों के लिए प्रस्तावित है, तो भूमि का वास्तविक स्वामित्व और स्थिति स्पष्ट करने के लिए होने वाले सीमांकन पर रोक क्यों?
सीमांकन से आखिर किस बात का खतरा?
सीमांकन किसी भूमि पर निर्माण की अंतिम स्वीकृति नहीं होता, बल्कि जमीन की वास्तविक स्थिति, सीमा और उपलब्ध क्षेत्र को स्पष्ट करने की प्रशासनिक प्रक्रिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि भूमि को लेकर कोई विवाद या आपत्ति है, तो सीमांकन कराकर तथ्य सामने लाने के बजाय प्रक्रिया रोकना कितना उचित है?
बताया गया है कि नगर निगम की संयुक्त टीम द्वारा पावर हाउस रोड नहर पुल से राताखार मार्ग के पास भूमि की पैमाइश शुरू की गई थी। इसके बाद स्थानीय व्यापारियों की आपत्ति सामने आई और नायब तहसीलदार कार्यालय की ओर से 22 व्यापारियों सहित कुल 24 लोगों को सीमांकन संबंधी नोटिस जारी किए गए।
व्यापारियों की चिंता भी जायज, लेकिन समाधान क्या?
प्रस्तावित चौपाटी निर्माण को लेकर व्यापारियों का कहना है कि इससे वर्षों पुराने कारोबार पर असर पड़ सकता है और क्षेत्र में यातायात का दबाव बढ़ सकता है। व्यापारियों ने जिला चैंबर ऑफ कॉमर्स के पदाधिकारियों से मुलाकात कर अपनी आपत्ति रखी तथा बाद में कैबिनेट मंत्री लखनलाल देवांगन के समक्ष भी अपनी समस्या रखी।
ऐसे में दूसरा सवाल यह है कि क्या व्यापारियों की आपत्तियों का समाधान सीमांकन रोककर होगा या भूमि की स्थिति, प्रस्तावित निर्माण की सीमा और प्रभावित क्षेत्र को सार्वजनिक कराकर?
मंत्री के हस्तक्षेप के बाद रुकी प्रक्रिया?
जानकारी मिल रही हैं कि कैबिनेट मंत्री लखनलाल देवांगन ने कलेक्टर से चर्चा कर मौके पर निर्माण कार्य रोकने के निर्देश दिए हैं। मंत्री की ओर से कहा गया है कि जनहित और स्थानीय हितों को ध्यान में रखकर मामले पर विचार किया जाएगा।
लेकिन यहां भी सवाल खड़ा होता है—जब अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि प्रस्तावित निर्माण के लिए कितनी भूमि आवश्यक है, कितने व्यापारी प्रभावित होंगे और भूमि का वास्तविक उपयोग क्या है, तो इन तमाम तथ्यों को सामने लाने के लिए सीमांकन की प्रक्रिया पहले पूरी क्यों नहीं की जाती?
क्या विकास और व्यापारियों के हित के बीच रास्ता नहीं निकलेगा?
मामला केवल चौपाटी निर्माण का नहीं है। एक तरफ शहर में पार्किंग, फूड मार्केट और व्यवस्थित सार्वजनिक स्थल की जरूरत है, तो दूसरी तरफ वर्षों से कारोबार कर रहे व्यापारियों के हित भी जुड़े हुए हैं।
ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल है—
क्या सीमांकन कराकर वास्तविक स्थिति सामने लाने, व्यापारियों की आपत्तियां दर्ज करने और प्रस्तावित परियोजना की व्यवहार्यता जांचने के बाद कोई संतुलित समाधान नहीं निकाला जा सकता?
अब प्रशासन से सवाल
यदि भूमि सिंचाई विभाग की है, तो उसका स्वामित्व और वर्तमान उपयोग सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
प्रस्तावित 5.52 एकड़ भूमि की सीमा और वास्तविक स्थिति सीमांकन के जरिए स्पष्ट क्यों नहीं होने दी जा रही?
सीमांकन रोकने का प्रशासनिक और कानूनी आधार क्या है?
क्या व्यापारियों की आपत्तियों का समाधान परियोजना में आवश्यक बदलाव कर किया जा सकता है?
क्या चौपाटी, पार्किंग और फूड मार्केट से होने वाले जनहित और यातायात संबंधी लाभ-हानि का आकलन किया गया है?
यदि परियोजना जनहित में है तो क्या स्थानीय व्यापारियों को साथ लेकर वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की जाएगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी विकास परियोजना पर निर्णय लेने से पहले जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना ही सबसे जरूरी कदम नहीं होना चाहिए?
फिलहाल 23 सितंबर को प्रस्तावित सीमांकन को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अब निगाह प्रशासन के अगले कदम पर है कि वह भूमि की स्थिति, व्यापारियों की आपत्तियों और प्रस्तावित विकास कार्य—तीनों के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करता है।
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