कोरबा

“पहले पनपता है अतिक्रमण, फिर चलता है बुलडोजर” — आखिर जिम्मेदार कौन?

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कोरबा (ट्रैक सिटी)। शहरों में अतिक्रमण की समस्या अब आम होती जा रही है। सड़क किनारे धीरे-धीरे लगने वाले ठेले, गुमटियां और अस्थायी दुकानें समय के साथ स्थायी रूप ले लेती हैं। वर्षों तक प्रशासन की नजरों के सामने पनपता यह अतिक्रमण अचानक एक दिन कार्रवाई की जद में आ जाता है और फिर बुलडोजर चलाकर हटाया जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर ही अवैध कब्जों को रोका जाए, तो बाद में बड़ी कार्रवाई की जरूरत ही न पड़े। कई बार देखा जाता है कि सड़क किनारे एक-दो ठेले लगने से शुरुआत होती है और धीरे-धीरे पूरा क्षेत्र अतिक्रमण की चपेट में आ जाता है। इससे यातायात प्रभावित होता है, दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है और आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अतिक्रमण केवल गरीब या छोटे व्यापारियों की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी की कमी का भी परिणाम है। यदि नगर निगम, राजस्व विभाग और यातायात पुलिस समय-समय पर निगरानी करें, तो हालात नियंत्रण में रह सकते हैं।
कई मामलों में यह भी सामने आता है कि अतिक्रमण करने वालों को पहले मौखिक अनुमति या अनदेखी मिलती रहती है, लेकिन जब शहर सौंदर्यीकरण, ग्रीन कॉरिडोर या वीआईपी दौरे जैसी योजनाएं आती हैं, तब अचानक कार्रवाई शुरू हो जाती है। इससे छोटे व्यवसायियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है।
शहरवासियों का कहना है कि प्रशासन को केवल बुलडोजर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वैकल्पिक व्यवस्था और पुनर्वास की दिशा में भी गंभीर पहल करनी चाहिए। कई स्थानों पर नगर निगम द्वारा दुकानों का निर्माण कर आवंटन भी किया गया है, लेकिन इसके बावजूद लोग मुख्य सड़कों पर अतिक्रमण करते दिखाई देते हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि अतिक्रमण के खिलाफ स्थायी नीति बनाई जाए। शुरुआती स्तर पर रोक, नियमित मॉनिटरिंग, वैकल्पिक बाजार व्यवस्था और पारदर्शी कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकती है। वरना शहर में यही सवाल बार-बार गूंजता रहेगा —
“जब अतिक्रमण हो रहा था, तब जिम्मेदार कहाँ थे?”

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