कोरबा

रात 1:30 बजे कोरबा पहुंचीं बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा

सबसे पहले बच्चों के अपहरण एवं हत्या की घटनाओं से प्रभावित परिजनों से की मुलाकात

 

सबसे पहले बच्चों के अपहरण एवं हत्या की घटनाओं से प्रभावित परिजनों से की मुलाकात

बाल संरक्षण गृहों की सुरक्षा में चूक पर जताई सख्ती, बोलीं– केवल सुरक्षा घेरा पर्याप्त नहीं, बच्चों की मनोदशा का पुनर्वास भी जरूरी; गांवों में बनेंगी बाल संरक्षण समितियां, ड्रॉपआउट बच्चों के चार साल के आंकड़ों की होगी समीक्षा

कोरबा (ट्रैक सिटी)। छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा का कोरबा प्रवास बच्चों की सुरक्षा, उनके अधिकारों के संरक्षण और बाल अपराधों की रोकथाम के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। खास बात यह रही कि वे रात करीब 1:30 बजे कोरबा पहुंचीं और अपने प्रवास के दौरान सबसे पहले जिले में बच्ची के अपहरण एवं हत्या की दर्दनाक घटना से प्रभावित पीड़ित परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने शोकाकुल परिवार से मिलकर घटना के संबंध में जानकारी ली और उनकी पीड़ा सुनी। बच्ची के साथ घटित ऐसी गंभीर घटना को लेकर उन्होंने बाल सुरक्षा व्यवस्था को और प्रभावी बनाने तथा समाज में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसके बाद उन्होंने बाल संरक्षण गृहों की सुरक्षा व्यवस्था, वहां से बच्चों के बाहर जाने की घटनाओं, विधि से संघर्षरत बच्चों के मानसिक पुनर्वास, शिक्षा से वंचित बच्चों की स्थिति, बाल श्रम और गांव स्तर पर बाल संरक्षण समितियों के गठन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उनके वक्तव्य में एक बात स्पष्ट रही कि बच्चों की सुरक्षा केवल संस्थागत व्यवस्था मजबूत करने से संभव नहीं है, बल्कि उनकी मानसिक स्थिति, सामाजिक परिवेश और शिक्षा से जुड़ी समस्याओं को भी गंभीरता से समझना होगा।

रात 1:30 बजे पहुंचने का किया विशेष उल्लेख, बोलीं- अभी बहुत काम करना बाकी

डॉ. वर्णिका शर्मा ने में कहा कि आयोग की अध्यक्ष बनने के बाद पिछले एक वर्ष से वे लगातार प्रदेश के दूरस्थ वनांचलों, ग्रामीण क्षेत्रों और गांव-गांव का दौरा कर रही हैं। बच्चों की समस्याओं को समझने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए वे लगातार क्षेत्र में पहुंच रही हैं। उन्होंने कोरबा में रात करीब 1:30 बजे अपनी मौजूदगी का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। अभी तो थोड़ा काम हुआ है, जबकि बच्चों के हित में बहुत अधिक काम करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि आयोग लगातार सुदूर वनांचलों में भी बाल चौपाल आयोजित कर रहा है। इसके माध्यम से बच्चों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याओं, अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े विषयों पर जागरूकता फैलाई जा रही है।

बाल संरक्षण गृह का तीन बार निरीक्षण, सुरक्षा की हर चूक पर आयोग गंभीर

बाल संरक्षण गृहों में सुरक्षा व्यवस्था और बच्चों के बाहर निकलने की घटनाओं पर पूछे गए सवाल के जवाब में अध्यक्ष ने बताया कि आयोग की अध्यक्ष बनने के बाद वे अब तक तीन बार संरक्षण गृह का निरीक्षण कर चुकी हैं। इससे पहले भी निरीक्षण के दौरान वहां की व्यवस्थाओं में सुधार के लिए आवश्यक निर्देश दिए गए थे।

उन्होंने कहा कि संरक्षण गृहों में सुरक्षा व्यवस्था के कई स्तर होते हैं। इसे लेयर-वन, लेयर-टू और लेयर-थ्री के रूप में समझा जा सकता है। शुरुआती दो स्तरों पर सुरक्षा के इंतजाम होने के बावजूद कई बार मौके पर होने वाली छोटी-सी चूक बड़ी घटना का कारण बन जाती है।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि पिछली बार जब बच्चे संरक्षण गृह से बाहर गए थे, उस समय वहां रसोईघर का निर्माण कार्य चल रहा था। बच्चों को किसी प्रकार की अव्यवस्था का सामना न करना पड़े, इसलिए निर्माण कार्य कराया जा रहा था। इसी दौरान यदि कोई कर्मचारी गेट खुला छोड़ देता है तो यह छोटी-सी लापरवाही बच्चों के बाहर निकलने का अवसर बन सकती है।

उन्होंने कहा कि जो बच्चा बाहर जाने का अवसर तलाश रहा होता है, वह इसी तरह की छोटी-छोटी चूकों का इंतजार करता है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था के किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार्य नहीं है। आयोग ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेता है और संबंधित विभागों से प्रतिवेदन मांगकर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करता है। महिला एवं बाल विकास विभाग तथा संबंधित संस्थानों को सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए लगातार निर्देशित किया जा रहा है।

केवल बच्चों को संरक्षण गृह में रखना पर्याप्त नहीं, उनकी मनोदशा का पुनर्वास जरूरी

डॉ. शर्मा ने संरक्षण गृहों की समस्या के मूल कारणों पर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि जब कोई बच्चा संरक्षण गृह से बाहर जाने का प्रयास करता है तो हमें केवल सुरक्षा व्यवस्था की कमी पर विचार नहीं करना चाहिए, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि आखिर बच्चा वहां से जाना क्यों चाहता है।

उन्होंने विशेष रूप से विधि से संघर्षरत बच्चों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे बच्चों को केवल एक संस्थान में रखना ही पर्याप्त नहीं है। उनकी मानसिक स्थिति, व्यवहार, परिस्थितियों और भावनात्मक जरूरतों को समझना भी जरूरी है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हम केवल बच्चों को संरक्षण गृह में रख रहे हैं या उनके मन और मस्तिष्क के पुनर्वास के लिए भी काम कर रहे हैं? बच्चे का पुनर्वास केवल उसे सुरक्षित स्थान पर रखने से पूरा नहीं होता, बल्कि उसकी मनोदशा में सकारात्मक बदलाव लाना भी जरूरी है।

उन्होंने बताया कि बच्चों की काउंसलिंग की बहुत अधिक आवश्यकता है। इसके लिए आयोग आने वाले दिनों में रिहैबिलिटेशन साइकोलॉजिस्ट की व्यवस्था के लिए प्रयास कर रहा है, ताकि बच्चों को उचित मनोवैज्ञानिक सहायता मिल सके और संरक्षण गृहों से बाहर जाने जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

आंदोलन के दौरान की गई टिप्पणी पर भी प्रतिवेदन के बाद होगी कार्रवाई

आंदोलन के दौरान द्वारा की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर पूछे गए सवाल पर आयोग अध्यक्ष ने कहा कि इस मामले में संबंधित द्वारा कही गई बातों का उल्लेख प्रतिवेदन में किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि आयोग जब किसी घटना के संबंध में प्रतिवेदन मंगवाता है तो उसमें एक-दो नहीं, बल्कि सात महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी ली जाती है। घटना की गंभीरता, उसके प्रभाव और उससे जुड़े तमाम पहलुओं को प्रतिवेदन में शामिल किया जाता है।

उन्होंने कहा कि अभी आयोग को लिखित प्रतिवेदन प्राप्त होना है। प्रतिवेदन मिलने के बाद पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी। बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत आयोग के अधिकार क्षेत्र में जो भी कार्रवाई आती है, वह निश्चित रूप से की जाएगी।

गांव-गांव में बनेगी विलेज लेवल चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी

बाल अधिकारों के संरक्षण को गांव स्तर तक पहुंचाने के लिए आयोग द्वारा विलेज लेवल चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी यानी ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों के गठन की अनुशंसा की जा रही है। डॉ. शर्मा ने कहा कि इस दिशा में तेजी से प्रयास किए जाएंगे, ताकि गांवों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागरूकता और निगरानी का मजबूत तंत्र विकसित हो सके।

उन्होंने कहा कि बच्चों के साथ होने वाले शोषण, उत्पीड़न और अन्य अपराधों की रोकथाम के लिए केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

गांवों में यदि किसी बच्चे के साथ गलत व्यवहार हो रहा है, कोई बच्चा संकट में है अथवा उसके आसपास कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई देती है तो उसकी जानकारी समय रहते संबंधित विभागों तक पहुंचनी चाहिए। ग्राम स्तरीय समितियों के माध्यम से बच्चों की समस्याओं की पहचान और समय पर हस्तक्षेप में सहायता मिल सकती है।

उन्होंने कहा कि आयोग का उद्देश्य ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना और बच्चों के अधिकारों का हनन करने वाले लोगों को स्पष्ट संदेश देना है कि समाज अब बच्चों की सुरक्षा को लेकर सजग और सतर्क है।

चार वर्षों के ड्रॉपआउट आंकड़ों की होगी समीक्षा, कोरबा में जल्द बैठक

बच्चों के शिक्षा के अधिकार और स्कूल छोड़ने की समस्या पर भी आयोग अध्यक्ष ने महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश के विभिन्न जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों से लगातार जानकारी मांगी जा रही है। आयोग ने बीते चार वर्षों में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

उन्होंने कहा कि कुछ आंकड़े आयोग के पास उपलब्ध हैं, लेकिन समस्या की वास्तविक स्थिति समझने के लिए तुलनात्मक आंकड़ों का होना जरूरी है। इसके आधार पर समीक्षा की जाएगी कि आखिर बच्चे किन परिस्थितियों में पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

क्या बच्चे आर्थिक अभाव के कारण स्कूल छोड़ रहे हैं? क्या परिवार की परिस्थितियां इसकी वजह हैं? क्या विशेष आवश्यकता वाले बच्चों तक शिक्षा की सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं? अथवा सरकारी योजनाओं और विभागीय निगरानी में कोई कमी रह जा रही है? इन सभी पहलुओं को समझने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि कोरबा जिले में भी आने वाले दिनों में इस विषय पर एक कड़ी समीक्षा बैठक आयोजित की जाएगी। इसमें ड्रॉपआउट बच्चों के आंकड़ों और उनके कारणों पर चर्चा होगी। आयोग यह जानना चाहता है कि विकास और सरकारी योजनाओं की पहुंच वास्तव में बच्चों तक कितनी हो पा रही है।

बाल चौपाल और ‘समझदार पर सशक्त प्रदेश’ अभियान से जागरूकता

बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए आयोग केवल शिकायतों पर कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि लगातार जागरूकता अभियान भी चला रहा है। डॉ. शर्मा ने बताया कि आयोग सुदूर वनांचलों में जाकर बाल चौपाल आयोजित कर रहा है। इसके माध्यम से बच्चों से सीधे संवाद किया जाता है और उनके अधिकारों तथा सुरक्षा से जुड़े विषयों पर जानकारी दी जाती है।

इसके साथ ही ‘समझदार पर सशक्त प्रदेश’ अभियान के माध्यम से भी लगातार जागरूकता फैलाई जा रही है। सोशल मीडिया और मीडिया के विभिन्न माध्यमों से बाल अधिकारों से संबंधित जानकारियां लोगों तक पहुंचाई जा रही हैं।

उन्होंने मीडिया प्रतिनिधियों से विशेष अपील करते हुए कहा कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा केवल आयोग की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए समाज, प्रशासन, अभिभावकों और मीडिया सभी को मिलकर काम करना होगा।

उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को अपने आसपास कोई बच्चा संकटपूर्ण परिस्थिति में दिखाई देता है, उसके साथ शोषण या उत्पीड़न होने की आशंका है अथवा कोई संदिग्ध गतिविधि नजर आती है तो तत्काल चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 पर सूचना देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समय पर मिली सूचना किसी बच्चे को बड़ी परेशानी से बचा सकती है। आयोग को जागरूकता अभियान के सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं।

बच्चों की सुरक्षा के लिए समाज और प्रशासन को मिलकर करना होगा काम

डॉ. वर्णिका शर्मा के कोरबा प्रवास में सामने आए मुद्दे स्पष्ट करते हैं कि बाल अधिकारों का संरक्षण केवल किसी एक विभाग या संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। बच्चों के अपहरण एवं हत्या जैसी गंभीर घटनाओं की रोकथाम, संरक्षण गृहों की सुरक्षा, विधि से संघर्षरत बच्चों का मानसिक पुनर्वास, स्कूल ड्रॉपआउट की समस्या और बाल शोषण के प्रति जागरूकता जैसे विषयों पर सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

रात करीब 1:30 बजे कोरबा पहुंचकर सबसे पहले बच्चों के अपहरण एवं हत्या की घटनाओं से प्रभावित परिजनों से मुलाकात करना उनके दौरे का महत्वपूर्ण पहलू रहा। इसके बाद उन्होंने विभिन्न व्यवस्थागत कमियों और सुधार की जरूरतों पर अपनी बात रखी।

अब कोरबा में प्रस्तावित समीक्षा बैठक, बाल संरक्षण गृहों की व्यवस्थाओं में सुधार, रिहैबिलिटेशन साइकोलॉजिस्ट की व्यवस्था और ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों के गठन की दिशा में होने वाली प्रगति पर नजर रहेगी।

क्योंकि बच्चों का संरक्षण केवल उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने का नाम नहीं है, बल्कि उन्हें भयमुक्त वातावरण, बेहतर शिक्षा, मानसिक संबल और सुरक्षित भविष्य देना भी उतना ही आवश्यक है।

विशेष पहल : भारी बस्तों से बच्चों की सेहत पर असर, वजन तय करने की अनुशंसा

छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्कूली बच्चों पर भारी बस्तों के बढ़ते बोझ को गंभीरता से लेते हुए स्कूल शिक्षा विभाग को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत स्कूल बैग का वजन निर्धारित करने की कड़ी अनुशंसा की है। आयोग का मानना है कि भारी बस्तों के कारण बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य और रीढ़ की हड्डी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों की उम्र और कक्षा के अनुरूप बस्ते का वजन तय होना चाहिए, ताकि उन्हें अनावश्यक शारीरिक बोझ से बचाया जा सके। आयोग ने इस दिशा में स्कूल शिक्षा विभाग से प्रभावी कदम उठाने की अनुशंसा की है।

 

 

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