एक समय था जब दीपावली, होली, शादी-विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में सोनपापड़ी का डिब्बा मिठाई के साथ खुशियां बांटने और अपनापन जताने का एक खूबसूरत माध्यम हुआ करता था। मेहमानों के स्वागत से लेकर रिश्तेदारों और मित्रों को उपहार देने तक सोनपापड़ी की अपनी अलग पहचान थी। इसकी मिठास में त्योहारों की खुशबू और रिश्तों की आत्मीयता घुली होती थी। लेकिन बदलते समय के साथ अब यही सोनपापड़ी मजाक का विषय बनती जा रही है।

आज सोशल मीडिया पर सोनपापड़ी को लेकर तरह-तरह के मीम्स और चुटकुले देखने को मिलते हैं। दीपावली आते ही एक-दूसरे को सोनपापड़ी देने, उसे आगे किसी और को थमा देने और इसे कम कीमत वाला उपहार बताने की बातें आम हो गई हैं। कई लोग तो सोनपापड़ी का डिब्बा मिलने पर खुशी जताने के बजाय उसे हल्के अंदाज में लेते हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों?

दरअसल, बदलती जीवनशैली और दिखावे की बढ़ती प्रवृत्ति ने उपहारों का अर्थ भी बदल दिया है। अब उपहार की अहमियत उसकी भावना से अधिक उसकी कीमत, ब्रांड और आकर्षक पैकेजिंग से आंकी जाने लगी है। महंगी मिठाइयां, ड्राई फ्रूट्स और आकर्षक गिफ्ट पैक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनते जा रहे हैं। ऐसे में पारंपरिक मिठाई सोनपापड़ी को कई लोग साधारण उपहार समझने लगे हैं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी उपहार की असली कीमत उसके बाजार भाव से नहीं, बल्कि उसे देने वाले की भावना से तय होती है। सोनपापड़ी भी कभी इसी अपनत्व और सम्मान की प्रतीक रही है।
समय बदल सकता है, पसंद बदल सकती है, लेकिन किसी की दी हुई मिठाई का मजाक बनाना हमारी सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है। आखिर मिठास बांटने के लिए दिए गए उपहार को तिरस्कार की नजर से क्यों देखा जाए? उपहार छोटा हो या बड़ा, उसकी असली मिठास रिश्तों में होनी चाहिए, कीमत में नहीं।

